kala paani jail में होते थे | औरतों के साथ कैसे कैसे गंदे काम।

kala pani jail – आज मैं आपको बताने जा रहा हूं (सेलुलर जेल) या फ़िर ये कहूं काला पानी की सज़ा के बारे में क्या है। ये और ये इतनी ख़तरनाक क्यूं है कि इस से बचना लगभग नामुमकिन सा है और भी इस से जुड़ी बहुत सी बातें की को उस जेल से भागने में कामयाब हुए उसके साथ क्या क्या हुआ उस टापू में आदिवासियों के साथ।


दरअसल 1787 में ब्रिटिश सरकार कैदियों को दूर दराज दीपों पे भेजती थी जो उनके खिलाफ जाते थे पहले के समय में पैनाग,अरकन,देनासरम एंव सिंगापुर भेजे जाते थे, लेकिन फिर उन्हें अण्डमान कि सेलुलर जेल में भेजा गया।

उनका मुख्य उद्देश्य था कि को जहाज अण्डमान टापू से गुजरता था उसे आदिवासी लोग तोड़ फोड़ देते थे इसलिए इसे सुरक्षित माना गया के इस टापू से कोई कैदी भाग नहीं सकता है। ये जेल 2000 किलोमीटर दूर तक चारों तरफ से पानी से घिरी हुई थी।


उस जेल में कैदियों की हालात हद से जायदा बुरी थी उन्हें दिन में सिर्फ 2 रोटी दी जाती थी और पहनाने को सिर्फ एक लंगोट वहां का वातावरण भी अनुकुल नहीं था। लगातार 3 3 दिन तक बारिश होती थी अचानक से अंधेरा सा छा जाता था पीने को साफ पानी नहीं मिलता था जिस वजह से सरकार ने उस टापू को खाली करने का फैसला किया।

मगर जब भारत में 1857 में स्वतंत्रता संग्राम प्रारंभ हुआ तो अंग्रेजो ने दोबारा यहां कैदियों को भेजना शुरू किया। उनके लिए कानून बना के सज़ा ख़तम होने पर उन्हें अण्डमान पे ही रहना होगा उन्हें वापिस उसके देश नहीं भेजा जाएगा।

उस जेल में एक कैदी था शेर अली खान नाम का उसपे जब पबंदी लगी वापिस जाने पे तो उसने चाकू से अंग्रेजी अफ़सर का पेट फाड़ दिया उसे तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया और महारानी विक्टोरिया ने शेर अली खान को फांसी का हुक्म दे दिया । 2 महीने तक सताया गया और फिर बाइपर दीप पर फांसी दे दी गई ।

इस घटना के बाद कैदियों के साथ सख्त बर्ताव करने लगे ।उन्हें घास-फूस की झोपड़ियों में बाहर रहते थे। खाने को कुछ नहीं।कैदी दुर्बल हो गया और अकाल मृत्यु होने लगी l

(रामपाल सिंह की किताब सज़ा ए काला पानी के हिसाब से) एक बार एक दूधनाथ तिवारी नाम का कैदी अपने साथियों के साथ उस जेल से भागने में कामयाब हो गया था।
लेकिन जंगल में राशन पानी ना मिलने से कुछ साथी मर गए और कुछ साथियों को आदिवासियों ने घेर लिया और अपने जहर से लगे तीरो से घायल कर दिया जिसमें सिर्फ तीन कैदी ही बच निकले उनमें से एक दूधनाथ तिवारी भी था।

इन तीनों को आदिवासियों ने बहोत मारा लेकिन दूधनाथ तिवारी ने हाथ पैर जोड़ कर खुशामद करके बच निकला आदिवासियों ने उसके कपड़े उतारे उसके शरीर पर लाल मिट्टी का लेप लगाया को आदिवासियों का भेश था उस अपने जैसा बना लिया और दूधनाथ तिवारी आदिवासियों के साथ रहने लगा।

और जब आदिवासियों को उसपे भरोसा हो गया तो उन्होंने आदिवासी कन्या से उसकी शादी कर दी। लेकिन जब आदिवासियों ने अंग्रेज़ सिपाहियों पर हमला किया तो मौका पाकर दूधनाथ तिवारी ने अंग्रेजो को सूचना दी, और सब हाल बता दिया।जिस वजह से उसे माफ करके उसके देश वापिस भेज दिया गया।

9 फरबरी 1946 को सिंगापुर में मुकदमा चला और अंग्रेज़ अफसरों को सज़ा दी गई निकोबार में इतना अत्याचार करने के लिए और इस तरह सेलुलर जेल बंद हो गई हमेशा के लिए 1946 में।


मगर अब वो जेल सिर्फ एक घूमने कि जगह बन गई है अब वहां महात्मा गांधी पार्क, स्टेडियम, बनस्पती संग्राहालय,मानव विज्ञान संग्राहालय, समुंदरी मेरिन संग्राहालय, जीव-जंतु संग्राहालय आदि|

रिसर्च का सोर्स- रामपाल सिंह की किताब (सज़ा ए काला पानी)

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